सलमान, आमिर और शाहरुख खान की तीन बहुचर्चित फिल्में फिल्में 2008 में प्रदर्शित हुईं।

सलमान की “युवराज”, शाहरुख की “रब ने बना दी जोड़ी” और आमिर की “गजनी”। तीनों फिल्मों की कहानियां मुख्यत: प्रेम-आधारित थीं और उनकीं नायिकाएं खान- नायकों से लगभग आधी उम्र की थीं।

“युवराज” में सलमान की नायिका कैटरीना, “रब ने..” में शाहरुख की नायिका अनुष्का और “गजिनी” में आमिर की नायिका आसिन।

“युवराज” बुरी तरह पिटी और सलमान के हिस्से भी अपने थके चेहरे और बुझे अभिनय के लिए कटु आलोचना आई।

“रब ने..” और “गजनी” शाहरुख और आमिर के बदले “गेटअप” के कारण प्रदर्शन से पहले ही चर्चित हो गईं। शाहरुख ने आम आदमी का चोला धारण किया तो आमिर ने पहलवानी शरीर बनाया। “रब ने..” ने भी अच्छी कमाई की और “गजनी” ने भी कमाई के रेकॉर्ड तोड़े।
लेकिन हमारी नजर में, कमाई के रेकॉर्ड तोड़ने के बावजूद “गजनी” के मुकाबले “रब ने..” अधिक लंबे अर्से तक याद रखी जाएगी। इसलिए, कि “रब ने..” एक साधारण जिंदगी में घटित होने वाली प्रेम कहानी थी जो फिल्म खत्म होने के बाद दर्शक के चेहरे पर मुस्कान छोड़ जाती हैं।

लेकिन “गजनी” दक्षिण भारतीय और हिन्दी फिल्मों के प्रचलित फार्मूलों का ऎसा मिश्रण है जिसमें प्रेम पर हिंसा का मसाला हावी हो गया है और फिल्म समाप्त होने के बाद दिमाग पर बोझिलता बनी रहती है।

“स्वदेस” और “चक दे” के बाद “रब ने..”,शाहरुख की एक और साधारण आदमी की असाधारण (और प्रेरक) कहानी साबित हुई है, जबकि “गजनी”, “फ़ना” के बाद आमिर की एक और मार्केटिंग सफलता लेकिन कहानी के नाम पर कबाड़ा फिल्म नजर आती है।

“गजनी” में हीरो-हीरोइन की प्रेम कहानी को छोड़ दें तो बाकी पूरी फिल्म असंभाव्य और बेतुके संयोगों से भरी पड़ी है। आमिर का अभिनय अपनी जगह अब भी दुरुस्त है, लेकिन कहानी के महत्व से उनकी पकड़ फिसलती जा रही है। “सरफरोश” और “लगान” जैसी चुस्त कहानियों की जगह बदन- बनाऊ और बाल-कटाऊ फार्मूले आमिर की फिल्मों पर हावी होते जा रहे हैं।

इसलिए हमारी नजर में तो शाहरुख ने ही 2008 में असली सफलता पाई, आमिर दूसरे नंबर पर रहे। सलमान फेल।


मुम्बई हमलों के बाद भारतीय नेता ने जिस तरह का अहंकार दिखाया- अब तक दिखा रहे हैं, उससे यही कहावत याद आती हैं।

इन नेताओं के “ऎतिहासिक अपशब्द” याद दिलाने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह जरूर याद रखें कि जनता के गुस्से के बावजूद ये नेता मानने से इनकार कर रहे हैं कि उनसे कहीं कोई गलती हुई।

तीन उच्च पदस्थ नेताओं को इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन वे इस्तीफा देने से तब तक इनकार करते रहे जब तक उन्हें जनता के दबाव में कुर्सी से घसीट कर अलग नहीं किया गया।

महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल ने तो तो भी इतनी शरम दिखाई कि इस्तीफा देने के बाद अपने गांव चले गए और मीडिया से दूर रहे। मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने इतनी शरम भी नहीं दिखाई।

उनके अहंकारी बयानों की कुछ मिसालें “बेटे को साथ ले गया तो गलत क्या किया?” ( ताज और ओबेराय के सरकारी मुआयने के विवाद पर), “किसी को तो जिम्मेदारी लेनी पड़ती है. केंद्रीय गृहमंत्री और राज्य के गृहमंत्री ने इस्तीफा दे दिया है, मुझे नहीं लगता अब मेरा इस्तीफा स्वीकार किए जाने की जरूरत है”, “मैं दो बार मुख्यंत्री बना और मैं सबसे भाग्यशाली तथा सबसे प्रसन्न व्यक्ति हूं कि मुझे संगठन से इतना कुछ मिला” ( इस्तीफे की प्रेस कांफ्रेंस में)।

यह सब हंस –हंस कर, अपने ही मजाक पर ठहाके लगाते हुए, अपने भाग्य और प्रसन्नता का सार्वजनिक वर्णन उस जनता के सामने करते हुए जो अब भी दुख, गुस्से और अपमान की आग में जल रही है।

सत्ता की थाली में जिन्हें लड्डू समझ कर नेताओं टपक रही है, वे इसी अहंकार के वटवृक्ष पर लगे विनाश के फल हैं।

जितने खाए हैं, पेट फाड़ कर निकलेंगे। आ गया है वह दिन।


भारत चांद पर जा पहुंचा है? यकीन नहीं होता… यह महानगरों की टूटी- फूटी सड़कों वाला, गांवों में गुल बिजली वाला देश चांद पर जा पहुंचा है? कब हो गया, कैसे हो गया, किसने किया यह चमत्कार?

जब हम सरकारी दफ्तरों में चाय पीते, फाइलें टालते समय गुजार रहे थे, घर का कचरा गली में फेंक कर सफाई कर रहे थे, सड़कों पर थूक रहे थे, भाषा-जाति-धर्म-प्रांत के नाम पर फूट डालने वाले नेताओं के पीछे अंधों की तरह भाग रहे थे, सिनेमा और क्रिकेट के नायकों पर फिदा हुए जा रहे थे….

तब कुछ गुमनाम वैज्ञानिक देश के किसी गुमनाम कोने में अपने जीवन के अमूल्य वर्ष बिता कर भारत को चांद पर भेजने के लिए काम कर रहे थे। चंद्रयान को बनाने के पहले और उसके जरिए  चांद पर तिरंगा भेजने के बाद भी, ये सारे वैज्ञानिक अब भी स्वेच्छा से गुमनामी में हैं, अब भी भारत के लिए काम कर रहे हैं।

आज लालबहादुर शास्त्री होते तो उन्हें इन वैज्ञानिकों पर गर्व होता।

भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खां, सुखदेव और राजगुरू होते तो उन्हें इन वैज्ञानिकों पर गर्व होता।

क्या आपको गर्व है अपने इन देशवासियों पर जिनकी कर्तव्यनिष्ठा से आज चांद पर तिरंगा मौजूद है?

अगर है, तो कृपया आप उनके सम्मान में कुछ करिए।

ज्यादा नहीं, सिर्फ इतना ही कि आपके जो सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य हैं उन्हें निभाने की कोशिश करिए।

कोशिश करिए कि जिस दफ्तर की तनख्वाह आपको रोटी देती है, उसका कार्य पूरी निष्ठा से करें।

कोशिश करिए कि सार्वजनिक स्थान पर आप कचरा फेंकने के भागी न बनें।

कोशिश करिए कि ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन आपके द्वारा न हो।

कोशिश करिए कि बिना लाउडस्पीकर लगाए समारोह- त्योहार की खुशी मना सकें।

कोशिश करिए कि अपने गांव- शहर- कस्बे में वृक्षारोपण करने में सहभागी बन सकें।

कोशिश करिए कि बांटने की भाषा बोलने वाले हर राजनेता से दूर रह सकें।

सबसे बढ़ कर: यह मत देखिए कि दूसरा क्या कर रहा है, यह देखिए कि आप क्या कर रहे हैं।  

बहुत सारी बातें हैं जो आप अपने देश को गर्व करने लायक बनाने के लिए कर सकते हैं।

कोशिश तो करिए।


सौरव गांगुली उर्फ क्रिकेट प्रेमियों के दादा रिटायर हो गए ( मतलब, कर दिए गए)। आज नागपुर में ऑस्ट्रेलिया के साथ खेला गया वर्तमान श्रृंखला का चौथा और आखिरी टेस्ट उनके टेस्ट जीवन का अखिरी टेस्ट था जिसमें अपनी आखिरी टेस्ट पारी में वे शून्य पर आउट हुए। ठीक डॉन ब्रैडमैन की तरह।

डॉन ब्रैडमैन को अपने टेस्ट जीवन में 100 का रन औसत हासिल करने के लिए सिर्फ चार रनों की रनों की जरूरत थी लेकिन वे अपने टेस्ट जीवन की आखिरी पारी में सिर्फ चार गेंदें खेल पाए और फिर शून्य पर आउट हो गए।

अब जब दादा जबरन रिटायर कर दिए गए हैं तो लाखों अन्य क्रिकेट प्रेमियों की ओर से उन्हें एक संदेश भेजा जा रहा है, भारत की सड़कों पर दौड़ते हजारों ट्रकों के पीछे लिखा हुआ।

“टाटा…… फिर मिलेंगे!”

इंगलैण्ड से घरेलू और पाकिस्तान से पाकिस्तान की धरती पर मुकाबला है अगले 2-3 महीनों में।

नतीजे बताएंगे किसकी –किसकी खटिया खड़ी होती है।

तब तक आस लगाए रखिए दादा की वापसी की। जैसे वे भी लगाए हुए हैं, चाहे ऊपरी तौर पर कुछ भी कहें :)


बात उस समय की है, जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी एक आत्मघाती हमले में मारे गए थे। प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रिका “ टाइम” ने उस हादसे की तस्वीर प्रकाशित नहीं की। लेकिन अपने इस फैसले के बारे में एक संपादकीय जरूर प्रकाशित किया।

“टाइम” ने लिखा, बावजूद इसके, कि यह हादसा दुनिया पर असर डालने वाली घटनाओं में से एक था, बावजूद इसके, कि राजीव गांधी विश्व के एक प्रमुख नेता थे, उन्होंने संपादकीय मंडल के विचार-विमर्श के बाद उनकी मृत्यु की तस्वीर प्रकाशित नहीं करने का फैसला किया।

“टाइम” के संपादकीय में लिखा गया था, कि “वे तस्वीरें प्रकाशित नहीं करने का फैसला इसलिए किया गया कि मौत ने उन्हें वह गरिमा नहीं बख्शी जिसके वह हकदार थे। हम वे तस्वीरें नहीं प्रकाशित कर उनकी गरिमा की रक्षा करना चाहते थे।“

यह बात हम भारतीय समाचार टीवी चैनलों को याद दिला कर एक अनुरोध करना चाहते हैं, कम से कम लाशों की तसवीरें तो प्रसारित नहीं करिए।

बम विस्फोट हो, या चामुंडा मंदिर में भगदड़, या लखनऊ फ्लाईओवर के धंसने से उसके नीचे दबे मृत शरीर- उनकी तस्वीरें दिखा कर क्या आप किसी मृतक की गरिमा का अनादर नहीं कर रहे? क्या उनके शोकग्रस्त परिवारों के प्रति आप यत्र- तत्र बुरी हालत में पड़ी लाशों की तस्वीरें टीवी पर दिखा कर उस हादसे से भी ज्यादा क्रूरता नहीं बरतते?

कितने ही अखबारों ने भोपाल गैस कांड के बाद लाशों की वीभत्स तस्वीरें छपने से परहेज किया था। तस्वीरें छपीं जरूर, लेकिन प्रतीकात्मक।

हादसों की रिपोर्टिंग करते समय क्या टीवी चैनलों पर भी पत्रकारिता की इस गरिमामय परंपरा का पालन नहीं किया जा सकता?