और दिलों को छूकर जगजीत के गीत अमर हो गए…
0 Comments Published by shakeel October 10th, 2011 in ख़ास ख़बर.शकील अहमद
मुंबई। होठों से छूकर भारतीय उपमहाद्वीप के लोग उन्हें आधुनिक युग की ग़ज़ल सबसे बेहतरीन गायक और एक तरह ग़ज़ल को दुबारा ज़िंदगी देनेवाला मानते हैं। जगजीत सिंह को ‘ग़ज़ल सम्राट’ कहा गया, ‘ग़ज़ल का बादशाह’ कहा गया। और जगजीत भी ग़ज़लकारों के पैरोकार की तरह ग़ज़ल को आगे लेकर बढ़ते रहे, उसे नए-नए रूप में ढालते रहे, उसे अनोखे अंदाज़ बख़्शते रहे, उसमें आधुनिक संगीत साज़ों का मिठास भरते रहे, और नई पीढ़ियों को लगातार ग़ज़ल से जोड़ते रहे, उन्हें ग़ज़ल की समझ देते रहे।
8 फरवरी 1941 को राजस्थान के श्री गंगानगर में एक सिख परिवार में पैदा हुए जगजीत सिंह ने पढ़ाई राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में हुई थी।
संगीत से वे बचपन से ही जुड़ गए थे और पंडित छगनलाल शर्मा से गंगानगर में ही संगीत की शिक्षा ली। बाद में उन्होंने सैनिया घराना के उस्ताद जमाल खान से हिंदुस्तानी शास्तीय संगीत शिक्षा ली और ख़याल, ठुमरी और धुपद भी सीखा।
जगजीत सिंह ने हिंदी, उर्दू, गुजराती, नेपाली, सिंधी, बांग्ला जैसी कई भाषाओं में सैकड़ों गीत और ग़ज़लें गाईं, भजन गाए और नज़्में गाईं।
जगजीत सिंह उस दौर में संगीत की दुनिया में आए जब ग़ज़लों पर पाकिस्तानी गायकों का साम्राज्य था। लेकिन जब जगजीत सिंह ने ग़ज़लों की दुनिया में आए तो सबको पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ गए।
उन्होंने ग़ज़ल की विधा को आधुनिक स्वरूप दिया और युवा पीढ़ी को उसकी ओर आकर्षित किया। उन्होंने ग़ज़ल की पारम्पतिक छवि को नया स्वरूप देने के लिए आधुनिक तकनीक का खूब इस्तेमाल किया और उन्होंने पश्चिमी संगीत वाद्यों का भी ग़ज़ल में इस्तेमाल किया, लेकिन सीमा नहीं लांघी। उन्होंने ग़ज़ल में आम-फहम शब्दों का इस्तेमाल किया और आम लोगों के दिलों को छू लिया।
जगजीत सिंह पहले भारतीय संगीतकार थे जिन्होंने अपने अलबम ‘बियॉन्ड टाइम’ के लिए पहली बार मल्टीट्रैक रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल किया।
फिल्मों में बहुत कम गाया, लेकिन जितना भी गाया लाजवाब और यादगार गाया। ‘साथ साथ’, ‘अर्थ’ और ‘प्रेम गीत’ की ग़ज़लें आज भी याद की जाती हैं।
जगजीत ने ग़ज़लों लोकप्रिय बनाने के लिए बहुत मेहनत की और हर विधा से उसका प्रचार किया। उन्होंने अपने ग़ज़लों के प्रचार के लिए और युवाओं मे ग़ज़ल का शौक परवान चढ़ाने के लिए ग़ज़लों के वीडियो तक बनाए।
उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर, फिराक गोरखपुरी की ग़ज़लों को अपनी आवाज़ की मिठास से श्रद्धांजलि अर्पित की तो कतील शिफाई, निदा फाज़ली, गुलज़ार, जावेद अख़्तर, सुदर्शन फाकिर जैसे इस ज़माने के गीतकारों के लफ्ज़ों को भी नए आयाम दिए।
उन्होंने बरसों तक अपनी पत्नी चित्र सिंह के साथ मिलकर ग़ज़लें गाईं, लेकिन एक जब 1990 में उनके एकलौते बेटे विवेक की मौत हो गई तो चित्र ने गाना बंद कर दिया।
जगजीत सिंह ने लता मंगेशकर के ‘सज्दा’ अलबम बनाकर भी एक इतिहास रचा।
उन्होंने एक संगीतकार के रूप में भी कई उपलब्धियां हासिल कीं।
जब गुलज़ार ने ‘मिर्ज़ा गालिब’ टीवी सीरियल बनाया तो जगजीत ने उसका संगीत दिया और ग़ज़लें भी गाईं।
जगजीत सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की कविताओं को भी गाया और ‘नई दिशा’ और ‘सम्वेदना’ नामक अलबम निकाले।
उन्हें सन 2003 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।
यह बहुत ही दुखद है कि जिस दिन जगजीत सिंह पाकिस्तानी ग़ज़ल गायक गुलाम अली के साथ एक साझा कार्यक्रम देनेवाले थे, उसी दिन उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया।
उन्होंने संगीत करियर में लगभग 80 अलबम बनाए।
जगजीत सिंह को संसद भवन में गाना का सौभाग्य भी मिला। 10 मई 2007 को 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ पर उन्होंने बहादुर शाह ज़फर की ग़ज़ल ‘लगता नहीं दिल मेरा उजड़े दयारे में’ गाकर इतिहास रचा।
क्या कांग्रेस ‘बदले की राजनीति’ खेल रही है?
0 Comments Published by shakeel September 6th, 2011 in राजनीति की बात.मुंबई। रामलीला मैदान में योगगुरु बाबा रामदेव द्वारा कालेधन के खिलाफ शुरू हुआ आमरण अनशन जब केंद्र सरकार ने जोर-जबरदस्ती खत्म करवाया, तो बाबा रामदेव और कांग्रेस सरकार के बीच कड़वाहट कुछ इस कद्र बड़ी की दोनों खुलेआम एक-दूसरे की निंदा करने लगे और आरोप-प्रत्यारोप का एक लंबा दौर शुरू हो गया और फिर उसके बाद शुरू हुआ सरकार की बदला लेने की कार्रवाई का दौर।
उसे बदला लेने की कार्रवाई इसलिए कह सकते हैं कि इससे पहले सरकार ने बाबा रामदेव को मनाने के लिए खूब जतन किए और तरह-तरह से समझाया, लेकिन जब बाबा टस से मस नहीं हुए, तो उसने जबरदस्ती का रास्ता अपनाया और उनका अनशन तुड़वाकर दम लिया।
और फिर शुरू हुआ बाबा रामदेव, उनकी कम्पनियों और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ सरकारी एजेंसियों द्वारा जांच-पड़ताल का लम्बा सिलसिला! आखिर सरकार ने यह काम इससे पहले क्यों नहीं किया था, क्यों सरकार ने यह पता नहीं करवाया था कि बाबा रामदेव की कम्पियां फर्जी हैं या बालकृष्ण विदेशी हैं?
यानी सरकार और बाबा रामदेव के बीच अनबन जब सरे-आम हुई तो सरकार ने भी कमर कस ली उन्हें सबक सिखाने के लिए।
बाबा रामदेव से पहले इस तरह की कार्रवाई पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण के खिलाफ भी की गई थी, हालांकि इसके पीछे सरकार प्रत्यक्ष रूप से नहीं थी, लेकिन माना जाता है कि अमर सिंह के मार्फत सरकार ने ही शांति भूषण-अमर सिंह और मुलायम सिंह के बीच हुई विवादापस्द बातचीत के कैसेट को सरेआम किया।
फिर बारी आई, आंध्र प्रदेश के पूर्व व दिवंगत मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के बेटे और कांग्रेस से बागी हुए नेता जगनमोहन रेड्डी की, जिन्हें कांग्रेस से अलग होकर एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने का खामियाजा भुगतना पड़ा। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों सीबीआई को आदेश दिया कि वह जगनमोहन की अकूत संपत्ति की जांच करे। इस पर जगनमोहन ने कहा था कि उन्हें कांग्रेस छोड़ने के कारण निशाना बनाया जा रहा है।
उसके बाद बारी आई किरण बेदी, ओम पुरी, प्रशांत भूषण और फिर अरविंद केजरीवाल की। हालांकि इस बीच कांग्रेस के कई नेता अन्ना हजारे के खिलाफ भी जहर उगलते रहे और और उनके खिलाफ कई आरोप लगाते हुए उन पर मुकदमे भी दर्ज करते रहे।
किरण बेदी को रामलीला मैदान में सरकार को मुखौटाधारी कहने और ओम पुरी को सांसदों को अनपढ़, गंवार और नालायक कहने के एवज में विशेषाधिकार हनन के नोटिसों का सामना करना पड़ रहा है।
अब सरकार ने अन्ना के आंदोलन के कर्ताधर्ता और समाजसेवी अरविंद केजरीवाल को भी निशाना बना लिया है। एक ओर तो उन पर आरोप है कि उन्होंने आयकर विभाग में सरकारी नौकरी पर रहते हुए नौ लाख रुपए बकाया रखा है, जिसे उन्हें चुकाना होगा।
अन्ना इसे उनके साथियों के खिलाफ हो रही सरकारी साजिश मानते हैं, हालांकि केजरीवाल कहते हैं कि चूंकि मैं जनहित का काम कर रहा हूं, इसलिए मेरा यह बकाया माफ कर दिया जाना चाहिए।
आयकर विभाग ने अन्ना के एक अन्य साथी कुमार विश्वास को भी नोटिस भेजा है।
इस तरह यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सरकार उन लोगों पर खुलेआम कार्रवाई कर रही है, जो उसके खिलाफ कोई मंच खोल रहे हैं या उसके खिलाफ कुछ बोल रहे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस सरकार उसके खिलाफ बोलनेवाले किसी भी व्यक्ति के साथ वैसा ही व्यवहार करेगी, जैसा वह बाबा रामदेव के साथ कर चुकी है?
क्या सरकार अपनी बात न माननेवालों को पुराने मामलों में जवाबतलब करेगी या क्या वह उनके खिलाफ नोटिसें भेजकर उन्हें परेशान करेगी?
अगर ये सभी पहले से ही दोषी हैं, तो सरकार अब तक चुप क्यों बैठी थी?
क्या सरकार अब उनके खिलाफ इसलिए कार्रवाई कर रही है कि वे सरकार के खिलाफ उठकर खड़े हुए हैं?
आपकी क्या राय है, बताइएगा?
कब-कब बनी मुंबई आतंकवादियों का निशाना…
0 Comments Published by shakeel August 16th, 2011 in मुंबई में धमाके.मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी कही जानेवाली मुंबई पर आतंकवादियों ने कई बार योजनाबद्ध रूप से हमले किए हैं। पेश है उन हमलों का लेखा-जोखा :
* मुंबई पर आतंकवादी हमलों की शुरूआत 12 मार्च 1993 से हुई, जब मुंबई ने पहली बार शृंखलाबद्ध बम धमाकों का खौफनाक मंजर देखा और भुगता। इस दिन एक के बाद ग्यारह बम धमाकों ने मुंबई को दहलाकर रख दिया। आतंकवादियों ने योजना बनाकर शहर के 11 विभिन्न स्थानों को निशाना बनाया और खून का विभत्स खेल खेला। उन 11 स्थानों के नाम निम्नलिखित हैं : बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, नरसी नाथा स्ट्रीट (कत्था बाजार), सेना भवन के पास लकी पेट्रोल पम्प, झवेरी बाजार, सेंचुरी बाजार (वर्ली), एयर इंडिया बिल्डिंग, सेंटॉर होटल, (सांताक्रूज), सेंटॉर होटल (जुहू), नायगांव क्रॉस रोड, सी रॉक होटल और प्लाजा सिनेमा। इसके अलावा इस दिन माहिम के मच्छीमार नगर और हवाईअड्डे पर ग्रेनेड भी फेंके गए थे। इन बम धमाकों में 257 लोगों की मौत हुई और 713 लोग जख्मी हुए।
* सन 1998 में 23 जनवरी को कांजुरमार्ग स्टेशन पर, 24 जनवरी को गोरेगांव और मालाड तथा 27 जनवरी को विरार, सांताक्रूज और कांदीवली स्टेशन पर छह बम धमाके हुए, जिनमें चार लोगों की मौत हुई और 30 लोग घायल हुए।
* 2 दिसंबर 2002 को घाटकोपर में एक बस को निशाना बनाया गया, जिसमें दो लोगों की मौत हुई और 48 घायल हुए।
* 6 दिसम्बर 2002 को मुंबई सेंट्रल के एक फास्टफूड स्टॉल में जोरदार धमाका हुआ, जिसमें किसी की मौत तो नहीं हुई, लेकिन 25 लोग घायल हो गए।
* 27 जनवरी 2003 को विलेपार्ले स्टेशन के पास एक धमाका हुआ, जिसमें अमोनियम नाइट्रेट बम का इस्तेमाल हुआ था। इस धमाके में एक की मौत हुई थी और 20 घायल हुए थे।
* 13 मार्च 2003 को मुलुंड में बम धमाका हुआ। यह धमाका मुलुंड स्टेशन पर कर्जत जानेवाली ट्रेन में हुआ, जिसमें 11 लोगों की मौत हुई और 70 लोग घायल हुए।
* 25 अगस्त 2003 में झवेरी बाजार और गेटवे ऑफ इंडिया पर टैक्सियों में फिर बम धमाके हुए। इस बार मुंबई ने फिर एक बार शृंखलाबद्ध बम धमाकों का दृश्य देखा। इन दोनों धमाकों में कुल 52 लोगों की मौत हो गई और 100 लोग घायल हुए। इन धमाकों में सन 1993 के धमाकों के बाद दूसरी बार आरडीएक्स का इस्तेमाल किया गया।
* 28 जुलाई 2003 को घाटकोपर में दूसरी बार बम धमाका हुआ। यह बम धमाका बेस्ट की एक बस में हुआ, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और 32 लोग घायल हुए।
* फिर आया 11 जुलाई 2006 का दिन, जिसने फिर एक बार मुंबई को शृंखलाबद्ध बम धमाकों से दहला कर रख दिया। इस दिन सात लोकल ट्रेनों में खौफनाक बम धमाके हुए। ये धमाके खार, बांद्रा, जोगेश्वरी, माहिम, बोरीवली, माटुंगा और मीरा भाईंदर में हुए, जो केवल सात मिनट के अंतराल में ही हो गए। इन बमों में भी आरडीएक्स और अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल किया गया था। इस हमले में कुल 188 लोग मौत के मुंह में समा के गए, तो 817 लोग घायल भी हुए। इनमें से कई घायल ऐसे हैं, जो आज भी उसका दंश झेल रहे हैं।
* और आखिर में मुंबई को वह दिन भी देखना था, जिसे केवल बम धमाके कहकर नहीं छोड़ा जा सकता था। इसलिए इसे आतंकवादी हमले का नाम देना पड़ा, क्योंकि यह हमला देश के सबसे बड़े शहर के सीने पर खुलेआम किया गया था, पूरी साजिश के साथ, आतंकवादियों की पूरी एक टुकड़ी के साथ। मुंबई के इतिहास के इस बदनुमा दाग ने पूरे चार दिनों तक मुंबई को परेशान कर रखा। पुलिस के बाद कमांडोज को आतंकवादियों से भिड़ना पड़ा और तब कहीं जाकर 10 खूंख्वार आतंकवादियों में से नौ को उनके अंजाम तक पहुंचा दिया गया और एक अजमल कसाब को पकड़ लिया गया, जो आज भी मुंबई की जेल में कैद है।
इस हमले में लश्कर-ए-तैयबा का हाथ था। इस हमले में मुंबई को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इस हमले में 166 मासूमों ने अपनी जान गंवाई, जिनमें पुलिस और सेना के जवान भी शामिल थे। इस हमले में 300 लोग घायल भी हुए।
* और अब 13 जुलाई 2011 को मुंबई शहर ने अपने सीने पर फिर तीन बमों के निशान झेले। झवेरी बाजार, ओपेरा हाउस और दादर में हुए इन बम धमाकों में 17 लोगों की मौत हुई और 131 लोग घायल हुए।
क्या शेयर बाजार में गिरावट मंदी का संकेत है?
0 Comments Published by bhuvan August 13th, 2011 in ख़ास ख़बर.पिछले कई सालों से विकास की राह पर सरपट दौड़ रहे भारत के शेयर बाजारों में कई दिनों से चली आ रही सुस्ती ने इस सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन भयानक रूप धारण कर लिया। सेंसेक्स ने 650 अंकों से ज्यादा की डुबकी लगा दी, जबकि निफ्टी 5250 के स्तर से भी नीचे उतर आया। निफ्टी 52 हफ्ते के सबसे निचले स्तर तक गिर गया। भारत ही नहीं, दुनियाभर के शेयर बाजारों में गिरावट है। वजह है, अमेरिका और यूरोप की कमजोर आर्थिक स्थिति, जिसका असर भारतीय निर्यात में भारी गिरावट के तौर पर भी हमारे सामने आ सकता है। अगर अमेरिका और यूरोप की आर्थिक स्थिति जल्द ही ना सुलझी, तो भारत सहित एशिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था की सेहत पर इसका बुरा असर पड़ सकता है।
भारत और चीन में विकास की दर तो अच्छी है, लेकिन ये देश महंगाई को लेकर परेशान हैं। महंगाई पर लगाम लगाने के लिए भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने प्रमुख ब्याज दरों में कई बार वृद्धि कर दी है, लेकिन ब्याज दरों में वृद्धि के बावजूद महंगाई है की कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। (आरबीआई) की ओर से जुलाई में अल्पकालिक ऋण दरों (रेपो और रिवर्स रेपो) में की गई 0.50 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि से कार्पोरेट जगत भी सकते में आ गया है।
आशंका है कि इससे कंपनियों के मुनाफे पर बेहद बुरा असर पड़ेगा। कंपनियों के लिए बैंको से कर्ज उठाना और मंहगा हो जाएगा, जिससे उत्पादों की लागत बढ़ेगी। ऐसे में उत्पाद मंहगे बेचने होंगे जिससे बाजार में इनकी मांग प्रभावित होगी।
आम आदमी की बात करें तो आरबीआई के इस कदम के बाद घर, आवास और व्यक्तिगत कर्ज लेना पहले ही महंगा हो चुका है। पिछले कुछ समय से मुंबई जैसे शहरों में घर खरीदनेवालों की संख्या भी घटी है। रियल इस्टेट कंपनियों के शेयरों की भी जमकर पिटाई हो रही है। 5 अगस्त को दोपहर 12:15 बजे बीएसई समूह में रियल्टी वर्ग 5 फीसदी से ज्यादा कमजोर हो गया। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस सभी कुछ महंगा होता जा रहा है।
एक तो घरों के दाम आसमान छू रहे हैं, दूसरी तरफ बैंकों ने कर्ज महंगा कर रखा है। घरों की बिक्री घटी है, फिर भी प्रॉपर्टी मार्केट में मंदी का असर फिलहाल साफ नहीं दिख रहा है। लेकिन आशंका है कि यदि वैश्विक स्तर पर मंदी का साया गहराता रहा, आरबीआई की ब्याज दरें बढ़ती रहीं, कर्ज महंगे होते रहे, तो प्रॉपर्टी मार्केट में तेजी का बुलबुला कभी भी फूट सकता है।
कई बड़ी विदेशी कंपनियों ने कर्मचारियों की छंटनी की घोषणा कर दी हैं, जिसमें ब्लैकबैरी निर्माता रिम और एचएसबीसी बैंक भी शामिल हैं। साल 2008 में पूरी दुनिया मंदी का खौफनाक रूप देख चुकी है। तब एक बड़े अमेरिकी बैंक के दिवालिया होने के साथ मंदी की शुरूआत हुई थी। शेयर बाजार लुढ़के थे। अब फिर अमेरिका के सरकारी खजाने के खत्म होने की खबरें आ रही हैं, फिर शेयर बाजार ढह रहे हैं। क्या ये आनेवाला तूफान का इशारा है। वैसे, पिछली मंदी से उबरने की प्रक्रिया अब भी जारी ही है। ऐसे में अगर फिर मंदी आई तो संभलना मुश्किल ही होगा।
क्या राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने लायक हैं?
0 Comments Published by shakeel June 24th, 2011 in नेतागीरी.राहुल गांधी की चाची मेनका गांधी ने उन्हें लम्बी उम्र का आशीर्वाद देते हुए कहा कि वे देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो बनें, वैसे भी इस देश में प्रधानमंत्री बनने के लिए किसी योग्यता की जरूरत नहीं है।
मेनका गांधी ने राहुल गांधी की काबिलीयत पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है! उन्हें लगता है कि भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री में भी किसी प्रकार की योग्यता नहीं।
उन्हीं की पार्टी का दावा है कि अगर हिम्मत है तो कांग्रेस राहुल को प्रधानमंत्री बनाकर दिखाए, जनता को फौरन पता चल जाएगा कि उनके पास देश चलाने की क्षमता है या नहीं।
हालांकि दूसरी ओर पूरा कांग्रेस परिवार पिछले कई बरसों से राहुल को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए मुहिम-सी चलाए हुए है। आए-दिन उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जाता है। जब कभी मंत्रीमंडल में फेर-बदल की बात आती है, तो सवाल उठता है कि क्या इस बार उन्हें कोई मंत्री पद दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं होता और वे कांग्रेस के महासचिव के रूप में ही अपनी भूमिका निभाते आगे बढ़ जाते हैं।
ऐसा महसूस होता है कि हर कांग्रेसी का सपना है कि राहुल जल्द से जल्द प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करें, क्योंकि वह पद उन्हीं के लिए सुरक्षित है, मौजूदा प्रधानमंत्री तो बस उसे संभाले हुए हैं। मनमोहन सिंह जैसे दिग्गज और काबिल प्रधानमंत्री के रहते हुए और बिना किसी आंतरिक मतभेद के अगर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम प्रधानमंत्री के पद के लिए उछाला जाता रहे, तो यह सचमुच उस प्रधानमंत्री की गरिमा पर कुठाराघात है। लेकिन कांग्रेस के भीतर ऐसा होता रहता है।
प्रणव मुखर्जी से लेकर दिग्विजय सिंह जैसे कद्दावर नेता किसी न किसी रूप में राहुल को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करते हुए गौरव महसूस करते हैं। लेकिन वे पूरी विनम्रता से यह जरूर कहते हैं कि राहुल को देश का प्रधानमंत्री बनना है या नहीं इसका फैसला तो वे खुद करेंगे यानी वे जब चाहें प्रधानमंत्री बन सकते हैं हम सब तैयार हैं!
दिग्विजय सिंह को लगता है कि सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर अच्छी समझ रखनेवाले राहुल परिपक्व हो गए हैं। उनमें नेतृत्व करने की सारी खूबियां हैं।
कई अन्य नेताओं ने दिग्विजय सिंह की बातें दोहराई हैं और उन्हें लगता है कि सोनिया गांधी के बेटे राहुल में प्रधानमंत्री बनने के सारे गुण हैं।
कांग्रेस नेता शकील अहमद ने कहा कि अधिकांश पार्टी कार्यकर्ता महसूस करते हैं कि राहुल में अच्छे नेता बनने की क्षमता है।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पार्टी के कोषध्यक्ष मोतीलाल वोरा की नजर में राहुल देश को विकास के रास्ते पर ले जाने की क्षमता रखते हैं। वे दृष्टि सम्पन्न हैं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले राहुल को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश करने की मांग उठाई थी, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने उनकी मांग ठुकरा दी थी।
उनके द्वारा बोया गया बीज अब वट वृक्ष बन चुका है। हर एक कांग्रेसी नेता गाहे-बगाहे अपनी ख्वाहिश जाहिर करता रहता है कि राहुल को प्रधानमंत्री बना दिया जाए, हालांकि यह कहते हुए वे जरा भी झेंपते नहीं कि उन्हीं की पार्टी का एक विरिष्ठ नेता प्रधानमंत्री के पद पर बैठा हुआ है।
कांग्रेस की बातें और नीतियां कांग्रेस जाने, लेकिन देश को तो सोचना होगा कि क्या राहुल सचमुच हमारे प्रधानमंत्री बनने लायक हैं, क्या सचमुच उनमें इतनी क्षमता है कि वे देश, विदेश, रक्षा, वित्त, गृह विभागों से जुड़े मुद्दों को संभाल सकते हैं? क्या वे इतने जिम्मेदार हैं कि हजारों समस्याओं, परिशानियों से दो-चार हो रहे इस देश को बिना घबराए आगे ले चलेंगे? क्या विदेशों में जाकर वहां दिग्गजों से मिलकर अपनी बात कहने की सलाहियत उनमें है? क्या वे देश की गरीबी दूर करने के लिए नई योजनाओं की अगुवाई कर सकते हैं? क्या वे राजनीति के दलदल में फंसे राजनेताओं के बीच अपनी अलग छवि बना सकते हैं? क्या वे कृषि और नई तकनीक के बीच की खाई पाट सकते हैं? एक ओर अंधविश्वासों से घिरे और दूसरी ओर विज्ञान और तकनीक में विश्व भर में अपनी धाक जमाते देश की दो अलग-अलग प्रकृतियों के बीच क्या वे संतुलन बना सकते हैं?
क्या राहुल गांधी में इतनी क्षमता है कि वे कश्मीर का मुद्दा अपने बूते पर हल कर सकते हैं?
क्या राहुल गांधी पाकिस्तान से भारत के रिश्तों को दिशा दे सकते हैं? क्या वे चीन की कूटनीति का जवाब दे सकते हैं? क्या वे अमेरिका के सामने डटकर खड़े रह सकते हैं? क्या वे रूस को आज भी अपना सबसे अच्छा दोस्त कह सकते हैं? क्या वे पड़ोसी देशों से तालमेल बैठा सकते हैं?
राहुल अभी तक कई मुद्दों पर अपनी राय नहीं बना पाए हैं, यह सच है। ऐसा लगता है कि वे वही करते हैं जो उनसे कहा जाता है या फिर एक बार में एक ही काम करते हैं, जैसे कोई किसी प्रोजेक्ट पर काम करता हो। वे कई मुद्दों पर स्वतंत्र सोच बना नहीं पाए हैं, ऐसा लगता है। क्योंकि वे हर मुद्दे पर नहीं बोलते। लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर वे चुप रहे, बाबा रामदेव के मुद्दे पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा, हालांकि इस बीच वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसानों की मदद से कुछ खंगालते नजर आए। वे भ्रष्टाचार पर खूब बोलते हैं और कहते हैं कि युवा ही इसे खत्म कर सकते हैं, लेकिन काले धन पर कुछ नहीं कहते।
राहुल ने एक युवा होने के नाते पिछले सात बरसों में देश भर में भ्रमण कर युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया। वे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सभाएं लेने लगे और सन 2009 के चुनावों के दौरान उन्होंने केवल छह सप्ताह में ही 125 रैलियों को सम्बोधित किया और भारी भीड़ भी खींची।
लेकिन भीड़ को आकर्षित तो हर मशहूर हस्ती करती है। चाहे वे अमिताभ हों, शाहरुख हों या फिर ऐश्वर्य राय। लेकिन राहुल का काम तो उससे आगे जाता है। उन्हें ठोस जमीन पर खड़े होकर हर मुद्दे पर खुलकर बोलना होगा और अपने विचार रखने होंगे। देश को बताना होगा कि वे अगर प्रधानमंत्री बनते हैं तो देश को किस दिशा में ले जाएंगे। एक साफ, स्पष्ट भविष्य दिखाने की क्षमता उनमें होनी चाहिए।
सन 2014 में जब लोकसभा के चुनाव आएंगे तो पूरे कयास हैं कि राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाकर पेश किया जाए।
लेकिन क्या यह सही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में किसी भी मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं संभालनेवाले राहुल को देश का प्रधानमंत्री पद ही सौंप दिया जाए?
सन 2004 से सांसद बने राहुल ने अब तक किसी मंत्रालय का कार्यभार क्यों नहीं संभाला? इंदिरा गांधी भी तो प्रधानमंत्री बनने से पहले लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में मंत्री हुआ करती थीं। हां, यह और बात है कि अचानक राजनीति में आनेवाले राजीव गांधी पायलट की नौकरी करते-करते सीधे प्रधानमंत्री बन गए थे।
शायद यहां भी ऐसा हो! ऐसा हो सकता है। हो चुका है। तो अब क्यों न हो!
लेकिन आज इस लोकतांत्रिक युग में क्या किसी देश को अपने प्रधानमंत्री से हर वह उम्मीद नहीं करनी चाहिए जो देश को तरक्की की राह पर ले जाए?
क्या हर देशवासी को यह हक नहीं है कि वह सबसे काबिल, योग्य, समझदार, जिम्मेदार और समर्पित नेता को देश का प्रधानमंत्री चुने?
क्या सबसे बड़े राजनीतिक परिवार या देश को तीन प्रधानमंत्री देनेवाले परिवार की संतान के रूप में पैदा होना ही प्रधानमंत्री बनने की योग्यता हो सकती है?
अगर नहीं, तो फिर राहुल गांधी को जल्द से जल्द यह साबित करना होगा कि वे इसलिए प्रधानमंत्री नहीं बने हैं कि सत्ता उन्हें विरासत में मिली है, बल्कि इसलिए बने हैं कि उनमें काबिलियत है, योग्यता है और वे देश की बागडोर संभालने में सक्षम हैं। उन्हें दिखाना होगा कि वे हर तरह के निर्णय लेने में सक्षम हैं। उन्हें अपने अनुभव बढ़ाने होंगे, जिसके लिए उन्हें किसी मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालनी होगी, देश के आम लोगों के साथ केवल यात्राएं कर या उनके घर में कुछ समय बिताकर नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी भर के लिए उन्हें खुशियां देने का इंतजाम उन्हें करना होगा, उन्हें देश की राजनीति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना होगा और लगातार मेहनत करनी होगी, उन्हें साबित करना होगा कि वे सचमुच देश की बागडोर संभालने लायक हैं।
अगर कांग्रेसी नेता कहते हैं कि प्रधानमंत्री बनना न बनना राहुल के हाथ में है, तो फिर राहुल को ही यह फैसला करना होगा कि वे खुद इस पद के लायक हैं या नहीं।
लेकिन देश को भी फैसला करना होगा कि क्या वह वाकई राहुल गांधी को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है।
क्या वह राजनीतिक विरासत को किसी प्रधानमंत्री की योग्यता मानता है या उसकी अपनी योग्यता के बल पर उसे चुना जाना चाहिए?
आप बताइए, क्या राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बनने लायक हैं?
अगर ‘हां’, तो क्यों? और अगर ‘नहीं’ तो क्यों? अपनी राय दीजिए।