ओंकारा: हल्ला किस बात का भई?
Published by शेखचिल्ली July 31st, 2006 in फ़िल्में.देख आए ओंकारा।“ ठीक है भई, अच्छी फ़िल्म है, लेकिन यह बताइए कि अगर यह फ़िल्म शेक्सपियर के नाटक से प्रभावित नहीं होती तब भी क्या इसकी इतनी ही तारीफ़ होती? हमें लगा था कि फ़िल्म अद्भुत होगी। लेकिन इसे सिर्फ “अच्छी“फ़िल्म ही कहा जा सकता है।
अगर किसी अच्छी साहित्यिक रचना पर अच्छी फ़िल्म बनाने का सवाल है तो हमें शरतचंद्र की कालजयी रचना “परिणीता” पर 2005 में प्रदीप सरकार की इसी नाम की फ़िल्म ज़्यादा पसंद आयी थी। पर उस फ़िल्म की इतनी कलम तोड़ तारीफ़ नहीं हुई जितनी“ ओंकारा” की फ़िल्म समीक्षक कर रहे हैं। कारण जाहिर है।
अंग्रेजी के नाटक पर हिंदी फ़िल्म बनाना अधिक महान काम है बनिस्बत किसी भारतीय रचना पर फ़िल्म बनाना। उस फ़िल्म में भी सैफ अली खान ने शरतचंद्र के “शेखर दा” के ईर्ष्यालु प्रेमी को परदे पर साकार कर दिया था। पर तारीफ ओंकारा में उनके द्वरा निभाए पात्र “लंगड़ा त्यागी” की ज़्यादा हो रही है।
अजय देवगन “ओंकारा” में वैसे ही लगते हैं जैसे अपनी पिछली कई फ़िल्मों में लगते आये हैं। करीना कपूर वही डिज़ायनर कपड़े पहनती हैं जो वे अमूमन हर फ़िल्म में पहनती हैं। हम तो भई फ़िल्म समीक्षकों से ज़्यादा आम दर्शकों की राय पर अधिक भरोसा करते हैं। और जिस फ़िल्म को देखते हुए दर्शक मोबाइल पर खेल खेलने लगें तो वह उस फ़िल्म के बांधे रखने की ताकत पर सबसे बड़ी टिप्पणी होती है। कुछ ऎसा ही नज़ारा “ओंकारा” देख रहे दर्शकों में हमें नज़र आया था।
ME LORD! Main sirf sach kahunga aour sach ke siwa kuchh naheen kahunga……aapko Onkara dekhkar nirasha huee hamain iska khed hai,magar mera irada kisi ko bharmane ka katai naheen thha.Darasal yah film mane bhee naheen dekhee thee ,sirf ek anuman per maine niskarsh nikala thha ki yah film umda manoranjan karne wali hogi.magar afsos!Main galat thha.