प्यूर्टो रिको की जुलेका मेन्डोज़ा ने वर्ष 2006 का “ब्रह्माण्ड सुंदरी” का ख़िताब जीता और कुछ ही समय बाद स्टेज पर बेहोश हो गयीं।  शायद यह नतीजा था भूखे रह कर “सुंदर” बनने के प्रयास का। पिछले दिनों भारत में एक मॉडल ने एक किताब लिख कर ऎसी सौंदर्य स्पर्धाओं की पोल खोली थी कि किस तरह प्रतियोगिता में शामिल होने वाली लड़कियों को स्पर्धा की तैयारी के नाम पर भूखा रखा जाता है।

शायद मेन्डोज़ा के बेहोश होने से इन सौंदर्य स्पर्धाओं के नाम पर होने वाले अमानवीय तौर-तरीके फिर बहस का विषय बन सकें।



5 Responses to “ब्रह्माण्ड सुंदरी की बेहोशी”

  1. 1 Sharvari

    Yeh sub sundariyan behad ek jaisi lagti hain - kyonki sabhi ke chehre plastic surgery se banaye gaye hain, sabhi ke honth Botox injection se phoole hue hain aur sabhi ka vajan zaroorat se 10 kilo kam rakkha gaya hai..
    ek baat to main bhool hi gayi - in sabhi ladkiyon ko bhukhe, gareeb aur besahara logon ke bhale ki chinta hoti hai, sirf tabtak, jabtak unko yeh heeron ka taj mil na jaye!!!!

  2. 2 saroj singh

    ये सही है कि सौंदर्य प्रतियोगिता के नाम पर कड़े शेड्यूल में रखा जाता है और शायद इसी का नतीजा है कि मिस यूनिवर्स बेहोश हो गईं. रही बात सौंदर्य प्रतियोगिताओं की सच्चाई की तो अब ये किसी से छिपा नहीं है कि ग्लैमर की चकाचौंध के पीछे की दुनिया की सच्चाई कुछ और है. फिर भी हम सारा दोष व्यवस्था को देकर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते. अगर हम खुद ग्लैमर की दुनिया में जाने के लिए कोई भी समझौता करने के लिए तैयार हैं (जैसा कि आजकल खुलेआम हो रहा है) तो इसमें दूसरों को दोष देने या बहस करने से कोई फायदा नहीं. अच्छा और बुरा हर चीज में जुड़ी है ये हम पर है हम क्या चुनते हैं.

  3. 3 amita

    ताली हमेशा एक हाथ से नहीं बजती। ऐसी प्रतियोगिता आयोजित करने वाले और इसमें भाग लेने वाले दोनों बराबर के दोषी हैं। सब कुछ पहले से ही तय रहता है कि इस साल सौंदर्य प्रसाधन और सुंदरता से जुड़े क्षेत्र को किस देश में अपना जाल बिछाना है और अपना उत्पाद बेचना है। इसलिए उसी देश की सुंदरी के सर पर ताज रख दिया जाता है। जब भारत में जाल फैलाने की ज़रूरत थी तब भारतीय सुंदरियां ही लगातार हर प्रतियोगिता में जीत रही थीं। फिर भले ही प्रियंका चोपड़ा ने गलत जवाब दिया हो उन्हें विश्व सुंदरी का ताज पहना दिया गया था।
    ये प्रतियोगी ये नहीं जानती कि सिर्फ बाज़ारवाद को बढ़ावा देने के लिए उनके शरीर का इस्तेमाल किया जा रहा हैं। अपना तन मन लगाकर भूखा-प्यासा रहकर जो ये मेहनत करती हैं उसकी कोई अहमियत ही नहीं हैं। बस अपने मन को सुंदर रखो और सच्चे रहो दुनिया आपकी खूबसूरती की कद्र करेगी।

  4. 4 mitu

    इसमें इस्तेमाल किया ‘अमानवीय’ शब्द आयोजनकर्ताओं के व्यवहार का बिल्कुल सही चित्रण करता है। अरे भूख-प्यासा तो मनुष्य पिंजड़े में बंद जानवरों को भी रखता है और उनसे सर्कस में करतब कराता है। इन प्रतियोगिताओं में एक अंतर यह है कि इन लड़कियों को सिर्फ मेक-अप और अच्छे कपड़े दे दिए जाते है वरना तो इन्हें भी जानवरों की ही तरह भूखा-प्यासा रखा जाता है।
    और नतीजा वही होता है जो ब्रह्मांड सुंदरी के साथ हुआ।

  1. 1 Amoxicillin.

Leave a Reply

(Antispam code, 3 black symbols)
captcha image