भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों के विज्ञापनों में काम करने पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी हैं और कप्तान राहुल द्रविड ने बोर्ड के इस कदम पर नाराजगी जाहिर करने के बजाय कहा है कि बोर्ड तो हमेशा से खिलाडियों के हितों का ख्याल रखता आया है। उनका बयान पढ़िए यहां:

 

द्रविड यह भूल गए कि 2002 में वे उन विद्रोही खिलाड़ियों में शामिल थे जिन्होंने विज्ञापनों पर आईसीसी और बीसीसीआई की पाबंदी के खिलाफ झंडा उठाया था।

 

अब राहुल द्रविड ने दिखा दिया है कि अपने स्वार्थ के आगे उन्हें अपने साथी खिलाड़ियों या टीम के हितों की कतई परवाह नहीं है। इसीलिए द्रविड पहले चैपल की और अब बोर्ड की चापलूसी कर रहे हैं।

 

हमें दया आती है भारतीय टीम के खिलाड़ियों पर जो उन्हें पहले चैपल जैसा कुटिल प्रवृति का कोच मिला और द्रविड जैसा रीढ़ की हड्डीविहीन कप्तान। जिस मानसिक यातना से ये खिलाड़ी गुजरे होंगे, ये बस वही जानते हैं।

 

ऎसा कप्तान भला किस तरह अपनी टीम की नजर में आदर का पात्र बन पाएगा?



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