1992 में आई हॉलीवुड की फिल्म “पॉयज़न आइवी” की नकल पर बनी है रामगोपाल वर्मा की फिल्म “निशब्द”।
दोनों ही फिल्मों की कहानी विशुद्ध रूप से एक कुटिल, बदमिजाज और स्वार्थी लड़की की कहानी है जो ऎशो-आराम के जीवन के लिए अपनी सहेली के पिता पर डोरे डालती है और इसके लिए अपने शरीर का खुल कर इस्तेमाल करती है। पिता भी उसकी शारीरिक निकटता से खिल उठता है।
ऎसी फिल्म को आप कहां से प्रेम कहानी कह सकते हैं? लेकिन रामगोपाल वर्मा को शायद डर था कि नायिका को खलनायिका बनाने से भारतीय दर्शक नहीं जुटेंगे, इसलिए उन्होंने इसे 18 वर्षीया लड़की और 60 साल के वृद्ध की प्रेम कहानी कह कर प्रचारित किया।
अफसोस, इसके कारण दर्शक और भी दूर भाग रहे हैं।
अरे जब लड़की की कुटिलता और बूढ़े की कमजोरी पर फिल्म बनाई है तो उसे वही कहो ना, प्रेम कहानी क्यों कहते हो? दर्शक इतने बेवकूफ हैं क्या कि जो पर्दे पर दिख रहा है उसे नकार कर जो प्रचार में कहा जा रहा है उसे सच मानेंगे?
ठीक है, अमिताभ बच्चन बहुत अच्छा अभिनय करते हैं, लेकिन कहानी में कोई तुक तो हो? बूढ़ा पात्र अपनी बीवी से कहता है “पता नहीं उससे ( बेटी की सहेली से) कब प्यार हो गया।“ और पर्दे पर दिखाया जाता है कि वह बार-बार याद करता है उस लड़की द्वारा दिया गया चुंबन।

18 वर्षीया लड़की और 60 साल के वृद्ध के मनोविकारों की कहानी है “निशब्द”। प्रेमकहानी कह कर लोगों को उल्लू नहीं बना पाए रामगोपाल वर्मा।



1 Response to “निशब्द : चुराई हुई कहानी, वह भी अधकचरी ”

  1. 1 Deepak

    हाँ
    राम गोपाल वर्मा को सोचनी चाहिऐ थी कि नक़ल के जगह कुछ अक्ल से काम लेते तो शायद उनको मूवी फ्लॉप नही होती ! कहानी सही हो तो दर्शक भी पसंद करते है !

    धन्यवाद्
    दीपक कुमार

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