एकलव्य: डिज़ाइनर देगची
Published by शेखचिल्ली February 17th, 2007 in फ़िल्में.
फिल्म “एकलव्य” के बारे में ये शब्द हमने वरिष्ठ फिल्म समीक्षक ख़ालिद मोहम्मद की इस फिल्म की समीक्षा से लिए हैं, क्योंकि फिल्म देखने के बाद हमें “डिज़ाइनर” -“डिज़ाइनर” शब्द तो बहुत ख्याल आ रहा था लेकिन उससे तुक मिलाता और कोई शब्द याद नहीं आ रहा था।
विधु विनोद चोपड़ा की यह बहुचर्चित फिल्म आंखों के लिए बड़ी लुभावनी है- हर चीज डिज़ाइनर जो है- लेकिन दिमाग को बांध नहीं पाती क्योंकि कहानी में दम नहीं है।
एकलव्य- यानी अमिताभ बच्चन फिल्म में नौकर हैं शाही खानदान के, अंगरक्षक हैं लेकिन उनके कपड़े जितने भव्य हैं उतने उनके मालिक के भी नहीं हैं।
कहानी की बात मत पूछिए। अभिनय तो अमिताभ कमाल का करते ही हैं, लेकिन क्या इसी तरह का बूढ़ी आंखों से आंसू बहाना अब उनकी अधिकतर फिल्मों की पहचान नहीं हो गया है?
बल्कि सैफ का संयमित अभिनय हमें कहीं ज्यादा अच्छा लगा।
विद्या बालन का प्रेम दीवानी का अभिनय कोफ्त पैदा करने वाला था।
संजय दत्त मसखरे हैं, इसलिए अच्छे लगते हैं।
बाकी सभी अभिनेताओं को “गेस्ट आर्टिस्ट” कहना ठीक होगा।
एक बार देखने लायक है फिल्म। थोड़ा बोर हो सकते हैं।
कबूतर उड़ रहे हैं, अभिनेता रंगमंच की तरह धीरे-धीरे चल फिर रहे हैं, कलात्मक फिल्मांकन दिखाया जा रहा है ( जिसके चक्कर में एक बार पूरे तीन मिनट तक फिल्म के पर्दे पर कुछ नहीं दिखता, सिर्फ संवाद सुनाई देते हैं)।
इतना बताना काफी होगा कि फिल्म के पहले ही दिन आधा सिनेमाहॉल खाली था।
फिल्म का निर्देशन आला है। पर विधु विनोद चौपड़ा ने जहां इसे सिर्फ खुद की संतुष्टी के लिए बनाया है और अंधेरे वाला प्रयोग किया है, तो वे इसे सिर्फ आधे घंटे की लघु फिल्म के रूप में भी बना सकते थे। यह भी एक अनोखा प्रयोग होता….“लघु फिल्म में बड़े कलाकार”। फिल्म में विद्या बालन क्या बोलती हैं,यह उनके अलावा सिर्फ संवाद लेखक ही जानता होगा।