सौरव का टीम प्रवेश- खेल कम राजनीति ज्यादा
Published by मनोज दुबे November 30th, 2006 in क्रिकेट.
भारतीय टीम के कोच ग्रेग चैपल ने बेहद चालाकी से सौरव गांगुली को टीम से दरकिनार किया गया था। एक तरह से लग रहा था कि उनका करियर चौपट हो गया है। लेकिन धुन के पक्के ‘दादा’ ने हार नहीं मानी। एक साल बाद वे तिकड़मबाजी कर फिर भारतीय टीम में घुसने में कामयाब हो गए हैं। उनके टीम में चुने जाने से यह बात सिद्ध होती है कि चयनकर्ता खेल से कम राजनीति से अधिक प्रभावित होते हैं।
गांगुली के टीम में चुने जाने की दूसरी सबसे बड़ी वजह, दक्षिण अफ्रीका में एक दिवसीय मैचों में मिली करारी हार भी रही। जिस इलेक्ट्रानिक मीडिया ने ‘दादा’ के खिलाफ कभी माहौल बनाया था, वही उन्हें भारतीय क्रिकेट का खेवनहार बताने लगा।
इधर वी.वी.एस. लक्ष्मण का वनवास भी खत्म हुआ और उन्हें सीधे प्रमोट कर टीम का उपकप्तान बना दिया गया। कल तक लक्ष्मण को अनफिट बताकर टीम से दरकिनार कर दिया गया था, लेकिन चयनकर्ताओं को पता नहीं अब उनमें क्या दिखाई दिया जो उन्हें सीधे उपकप्तान बना दिया गया। एक तरह से यह पूर्व उपकप्तान वीरेन्द्र सेहवाग के लिए चेतावनी है- ‘ठीक से खेलों वरना बाहर का रास्ता नापों’।
इस बार टीम का चयन जिस तरह से किया गया है, उसे देखकर लगता है कि इसमें कोच ग्रेग चैपल और कप्तान राहुल द्रविड़ से सलाह मशविरा बिलकुल नहीं किया गया। दक्षिण अफ्रीका की हार ने क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को बैचन कर दिया। उसने बैचेनी के इस आलम में ही गंभीर, गांगुली और लक्ष्मण का चुनाव किया। संभव है चैपल को चिड़ाने के लिए गांगुली को टीम में जगह दी गई हो या फिर कोच को उसकी औकात दिखाने के लिए गांगुली को मोहरा बनाया गया हो।
‘दादा’ एक साल बाद टेस्ट टीम में वापसी कर रहे हैं, उनसे ढेर सारी उम्मीदें हैं, यदि वे उम्मीदों पर खरे उतरते हैं तो निश्चय ही उनके विरोधियों के सुर नरम होंगे। गांगुली को अपने प्रदर्शन से यह बताना होगा कि टेस्ट टीम में उनका चयन प्रतिभा के आधार पर किया गया है न कि राजनीति के आधार पर।
सौरव को अपनी लाइफ के उपर एक फिल्म बनानी चाहिए और फिल्म का नाम होगा “दादा की दादागिरी”
Saurav is a great cricketer,