क्यों दीवाली लगती है अपनी-अपनी सी
Published by अमिता October 20th, 2006 in आमंत्रण.
दीपावली आने की आहट से मन में एक उत्साह और उमंग सा जग जाता है।
बच्चों को स्कूल कॉलेज की लंबी छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार होता है। कामकाजी लोगों को ऑफिस में दो दिन के छुट्टियों का इसलिए इंतजार होता है कि वे अपने परिवार के साथ त्योहार मना सकें। जो अपने घर से दूर रहते हैं वे किसी तरह से छुट्टियां लेकर अपने अपनों के पास आ जाते हैं।
बच्चे नए कपड़े और पटाखों के लिए आतुर रहते हैं। कपड़ों, बर्तन, आकाशकंदिल, रंगोली, मिठाइययों की दुकानों में अपरम्पार भीड़। चारों ओर रोशनी ही रोशनी। घरों में साफ-सफाई शुरू हो जाती है। जिस घर के पास से गुजरो वहां से तरह-तरह से पकवानों की खुशबू आती है। और ऐसे माहौल में चाहे कितना भी काम हो, लोग थकते नहीं।
जब एक घर खुशियां मनाता है तो बगल के सारे घरों में वह लहर दौड़ पड़ती है। वह क्या धर्म और क्या जात-पात। इस त्योहार का पौराणिक महत्व चाहे जो हो लेकिन लोगों के मन में जो असली खुशी होती है वही दीवाली की महत्ता को बढ़ा देती है।
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