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	<pubDate>Mon, 08 Feb 2010 21:37:26 +0000</pubDate>
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		<title>“कमीने” और “संकट सिटी”</title>
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		<pubDate>Wed, 26 Aug 2009 09:24:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>फ़िल्में</category>
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		<description><![CDATA[एक ही विषयवस्तु ( कभी- कभी भोलेपन में हुआ अपराध भी जिंदगी बना देता है) पर बनीं दो फिल्में। एक महा- उबाऊ पर समीक्षकों की कृपा से हुई हिट, दूसरी फिल्म बेहतरीन, पर समीक्षकों की उपेक्षा से हुई गायब।
“कमीने” उस श्रेणी की फिल्म है जिसे हम “ऑस्कर फिल्म” कहते हैं। कलात्मक, प्रयोगधर्मी, सिरदर्दिया, अंधेरे में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>एक ही विषयवस्तु ( कभी- कभी भोलेपन में हुआ अपराध भी जिंदगी बना देता है) पर बनीं दो फिल्में। एक महा- उबाऊ पर समीक्षकों की कृपा से हुई हिट, दूसरी फिल्म बेहतरीन, पर समीक्षकों की उपेक्षा से हुई गायब।</p>
<p>“कमीने” उस श्रेणी की फिल्म है जिसे हम “ऑस्कर फिल्म” कहते हैं। कलात्मक, प्रयोगधर्मी, सिरदर्दिया, अंधेरे में फिल्माई गई, इतनी धीमी कि घड़ी की जगह कैलेण्डर देखने को दिल चाहे। अर्थात- फिल्म समीक्षकों की अति प्रिय, पांच में चार सितारा पाने वाली फिल्म।</p>
<p>दूसरी फिल्म “संकट सिटी”, जो प्रयोगधर्मी नाम के बावजूद हास्य से भरपूर, महा- तेज रफ्तार और के के मेनन और दिलीप प्रभावलकर के अनुपम अभिनय से जीवंत। घटनाक्रम इतनी तेजी से घूमता रहता है कि आपका सिर घूम जाए और जब तक आप संवाद पर दिल खोल कर हंसे, दृश्य बदल जाए। और सस्पेंस इस तरह आपको लपेट ले कि यह भूल कर कि आप सिनेमाघर में हैं आप मुख्य पात्रों पर पल-पल आ रही आपदा पर ऎसे सीट से उछलें जैसे आप भी पर्दे पर जी रहे हों।<br />
क्या आपने देखी थीं ये दो फिल्में? क्या राय है आपकी इस बारे में?
</p>
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		<title>शाहरुख खान पर कौन- कौन हंस रहा होगा?</title>
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		<pubDate>Tue, 28 Apr 2009 06:23:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>इधर-उधर की</category>
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		<description><![CDATA[जब सुनील गावस्कर ने कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम में चार कप्तान बनाए जाने के सिद्धांत की आलोचना की थी तब शाहरुख खान ने कहा था, मिस्टर गावस्कर ने 20-20 क्रिकेट नहीं खेला है इसलिए अपनी सलाह अपने पास रखें।
 सुनील गावस्कर पर भड़के शाहरूख!
आज शाहरुख की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स की दुर्दशा देख कर गावस्कर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जब सुनील गावस्कर ने कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम में चार कप्तान बनाए जाने के सिद्धांत की आलोचना की थी तब शाहरुख खान ने कहा था, मिस्टर गावस्कर ने 20-20 क्रिकेट नहीं खेला है इसलिए अपनी सलाह अपने पास रखें।<br />
<a target="_blank" href="http://josh18.in.com/showstory.php?id=424972"> सुनील गावस्कर पर भड़के शाहरूख!</a></p>
<p>आज शाहरुख की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स की दुर्दशा देख कर गावस्कर हंस- हंस कर लोट पोट हो रहे होंगे। धोखा दे कर कप्तानी से हटाए गए सौरव गांगुली के कलेजे को ठंडक मिल रही होगी।<br />
<a target="_blank" href="http://josh18.in.com/showstory.php?id=427842">बुकानन ने दिया गावस्कर को जवाब</a></p>
<p>तब तो शाहरुख को कोई नहीं समझा सकता था, अब शायद उन्हें अकल आ गई होगा कि क्रिकेट पैसे का नहीं, प्रतिभा का खेल है और पैसे की गठरी तो दुनिया में करोड़ों लोगों के पास है, लेकिन क्रिकेट का वरदान सिर्फ गावस्कर और गांगुली जैसे चंद खास लोगों को मिला है।
</p>
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		<title>घड़ी कमर में लटकाऊंगा.. मैं गांधी बन जाऊं..</title>
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		<pubDate>Fri, 06 Mar 2009 06:50:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>नया भारत</category>
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		<description><![CDATA[बचपन में पाठ्य पुस्तक में एक कविता पढ़ी थी, “मां खादी की चादर दे दे , मैं गांधी बन जाऊं।”
कविता में एक बच्चा मां से गांधी जी के जैसी वस्तुएं दिलवाने की मनुहार करता है ताकि वह भी उन्हें लेकर गांधी जी जैसा दिख सके।
उसमें गांधी जी की मशहूर घड़ी का जिक्र था। गांधी जी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बचपन में पाठ्य पुस्तक में एक कविता पढ़ी थी, “मां खादी की चादर दे दे , मैं गांधी बन जाऊं।”</p>
<p>कविता में एक बच्चा मां से गांधी जी के जैसी वस्तुएं दिलवाने की मनुहार करता है ताकि वह भी उन्हें लेकर गांधी जी जैसा दिख सके।</p>
<p>उसमें गांधी जी की मशहूर घड़ी का जिक्र था। गांधी जी घड़ी हाथ में नहीं बांधते थे, कमर में लटकाते थे। “घड़ी कमर में लटकाऊंगा&#8230;”</p>
<p>तब बाल मन के लिए गांधी जी आदर्श थे, उनकी तरह कमर में घड़ी बांधने की उत्सुकता होती थी।</p>
<p>आज वही घड़ी तस्वीर में देखने को मिल रही है क्योंकि उसकी अमेरिका में नीलामी हुई है।</p>
<p><img src="http://www.josh18.com/media/images/2009/Mar/05mar_watch.jpg" /></p>
<p>क्या आपको वह पूरी कविता और लेखक का नाम याद है?<br />
कविता कुछ इस प्रकार थी:-</p>
<p><strong>मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं<br />
सब मित्रों के बीच बैठ कर रघुपति राघव गांऊ</strong></p>
<p><strong>घड़ी कमर में लटकाऊंगा सैर सवेरे कर आऊंगा</strong></p>
<p><strong>मुझे रुई की पोनी दे दे </strong></p>
<p><strong>तकली खूब चलाऊं </strong></p>
<p><strong>मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं </strong>
</p>
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		<title>“विक्टरी”: क्रिकेट प्रेमी हैं तो देखने जाइए</title>
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		<pubDate>Tue, 03 Feb 2009 07:36:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>फ़िल्में</category>
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		<description><![CDATA[अगर आपको फिल्म देखना है तो कहीं और जाइए, और अगर आपको बड़े पर्दे पर क्रिकेट देखने का मज़ा लेना है तो फिल्म “ विक्टरी” देखने जरूर जाइए।
हम तो हैं क्रिकेट के बड़े दीवाने, इसलिए फिल्म समीक्षकों की आलोचनाएं अनदेखी कर, इष्ट- मित्रों की सलाह अनसुनी कर हम “विक्टरी” देखने चले गए और खूब आनंद [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अगर आपको फिल्म देखना है तो कहीं और जाइए, और अगर आपको बड़े पर्दे पर क्रिकेट देखने का मज़ा लेना है तो फिल्म <strong>“ विक्टरी”</strong> देखने जरूर जाइए।</p>
<p>हम तो हैं क्रिकेट के बड़े दीवाने, इसलिए फिल्म समीक्षकों की आलोचनाएं अनदेखी कर, इष्ट- मित्रों की सलाह अनसुनी कर हम “विक्टरी” देखने चले गए और खूब आनंद लिया बड़े पर्दे पर क्रिकेट की धमाचौकड़ी देखने का।</p>
<p>हर भारतीय क्रिकेट का दीवाना होता है और उसने खुद कभी क्रिकेट खेला हो या नहीं, जिंदगी में कभी बल्ला थामा हो या नहीं, उसके सपनों में भारतीय क्रिकेट टीम का सदस्य बनने का सपना जरूर शामिल होता है। उसके दिल में यह जरूर आता है, काश मैं भी वह टोपी पहन पाता- वह कोट पहन पाता जो भारतीय टेस्ट टीम के खिलाड़ी पहनते हैं।</p>
<p>एक मित्र का कहना था कि जब फिल्म “विक्टरी” में हरमन बावेजा भारतीय क्रिकेट टीम का “ब्लेजर” पहन कर आईने के सामने खड़े होते हैं तो दृश्य ने उनके रोंगटे खड़े कर दिए। यह हरमन की अभिनय क्षमता का नहीं बल्कि उस दृश्य से जुड़े क्रिकेट प्रेम का कमाल था।</p>
<p>सच बता रहे हैं, हम जब फिल्म देख रहे थे तो थियेटर में मुश्किल से दो दर्जन लोग थे। लेकिन उनमें से एक भी शख्स फिल्म खत्म होने तक अपनी जगह से नहीं हिला। “गज़नी” जैसी सुपरहिट फिल्म में भी दर्शकों को अंतिम दृश्य खत्म होने से पहले थियेटर छोड़ कर जाते देखा है हमने, लेकिन “विक्टरी’ जैसी जिस फिल्म की इतनी बुराई की गई है उसमें अंत तक हर दर्शक कुर्सी से चिपका बैठा रहा जैसे कुछ और क्रिकेट देखना चाहता हो।</p>
<p>बड़े पर्दे पर ब्रेट ली, सनत जयसूर्या, मुरलीधरन, हरभजन जैसे खिलाड़ियों को खेलते देखना मजेदार अनुभव था। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है असली मैचों के दौरान फिल्माई गई दर्शकों की प्रतिक्रियाएं फिल्म के मैचों में बखूबी जोड़ दी गई हैं। फिल्मी मैच में जो कमेंटरी की जाती है वह असली मैचों में हुई घटनाओं से इस तरह बेहतरी से जोड़ी गई हैं कि मजा आ जाता है।</p>
<p>सीधी सी बात है भैया, अगर क्रिकेट प्रेमी हो तो “विक्टरी” देखने जरूर जाना। अगर फिल्म प्रेमी हो तो <strong>“लक बाई चांस”</strong> देखने जाना जो हमें महा-उबाऊ लगी।
</p>
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		<title>“करोड़पति झोपड़िया कुत्ता” और ओबामा</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Jan 2009 09:49:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>नया भारत</category>
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		<description><![CDATA[भारत में “फॉरेन रिटर्न” की बड़ी इज्जत होती है। कोरियाई, चीनी, जापानी वगैरह नहीं, ब्रिटिश और अमेरिकी ठप्पा चाहिए, फिर देखो भारत में कैसे उसकी धूम मचती है। मीडिया तो चरण धो- धो कर पीता है उनके। वैज्ञानिक, कलाकार, लेखक, अंतरिक्ष वैज्ञानिक- जब तक देश में रहते हैं कोई पूछता तक नहीं। अंग्रेजी देस का [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में “फॉरेन रिटर्न” की बड़ी इज्जत होती है। कोरियाई, चीनी, जापानी वगैरह नहीं, ब्रिटिश और अमेरिकी ठप्पा चाहिए, फिर देखो भारत में कैसे उसकी धूम मचती है। मीडिया तो चरण धो- धो कर पीता है उनके। वैज्ञानिक, कलाकार, लेखक, अंतरिक्ष वैज्ञानिक- जब तक देश में रहते हैं कोई पूछता तक नहीं। अंग्रेजी देस का ठप्पा लगा और 24/7 गुणगान देख लीजिए भारत में।</p>
<p>यही हाल इन दिनों “करोड़पति झोपड़िया कुत्ता” और ओबामा का किया जा रहा है। तीन दिन हो गए ओबामा को शपथ लिए, अमेरिकी टीवी चैनलों तक ने उनकी शपथ और उसके बाद का नाच-गाना दिखाना बंद कर दिया है लेकिन भारतीय चैनलों पर सुबह-दोपहर-शाम ओबामा- स्तुति बंद नहीं हुई है।</p>
<p>बाकी समय में “करोड़पति झोपड़िया कुत्ता” (“स्लमडॉग मिलियनेर” का देसी अनुवाद:) ) का गुणगान किया जा रहा है। मालूम था कि फिल्म भारत में पहले प्रदर्शित हुई तो झोपड़पट्टी के कुत्ते भी “गजनी” छोड़ कर यह फिल्म देखने नहीं आएंगे। इसलिए मुम्बई पर बनी फिल्म होते हुए भी यह फिल्म भारत में अब तक प्रदर्शित नहीं की गई।</p>
<p>अब जब विदेशी पुरस्कारों का ठप्पा लग गया है तब भारत में प्रदर्शित की जा रही है फिल्म, क्योंकि निर्माताओं को मालूम है, जनता-जनार्दन अब जरूर टूटेगी फिल्म पर। और तो और, जिस उपन्यास पर फिल्म बनी है वह दूकानों में अब तक धूल खाती पड़ी थी, लेकिन फिल्म को पुरस्कार मिले तो हाथों- हाथ बिक गईं सारी प्रतियां।</p>
<p><strong>सबक:</strong> <em>झोपड़िया कुत्ता अंग्रेजी में भौंके, तो करोड़पति बनने में देर नहीं लगती। </em>
</p>
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</p>
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		<item>
		<title>काश, आज हमारा ऑफिस गांव में होता..</title>
		<link>http://www.garamchai.in/?p=671</link>
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		<pubDate>Fri, 09 Jan 2009 06:53:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>नया भारत</category>
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		<description><![CDATA[तो हम आज सुबह उठते, छोटे से ट्रांजिस्टर पर आकाशवाणी से समाचार सुनते कि मुम्बई में पेट्रोल नहीं मिलने से लोगों को भारी दिक्कत हो रही है, और आश्चर्य करते कि पेट्रोल की इतनी क्या जरूरत है।
फिर नाश्ता करके घर से निकलते और खरामा- खरामा टहलते हुए ऑफिस पहुंच जाते जो कि घर से दस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>तो हम आज सुबह उठते, छोटे से ट्रांजिस्टर पर आकाशवाणी से समाचार सुनते कि मुम्बई में पेट्रोल नहीं मिलने से लोगों को भारी दिक्कत हो रही है, और आश्चर्य करते कि पेट्रोल की इतनी क्या जरूरत है।</p>
<p>फिर नाश्ता करके घर से निकलते और खरामा- खरामा टहलते हुए ऑफिस पहुंच जाते जो कि घर से दस कदम की दूरी पर होता।</p>
<p>रास्ते में साइकिल से शहर जाते स्कूल के गुरु जी से दुआ- सलाम भी कर लेते।</p>
<p>ऑफिस जाकर कुर्सी- टेबल बाहर निकालते और नीम पेड़ के नीचे, गुनगुनी धूप में काम करने बैठ जाते।</p>
<p>पास की गुमटी से चूल्हे में लकड़ी जला कर बनाई गई दस पैसे की अदरकवाली चाय भी आ जाती। चाय आती तो साथी भी आ जाते, अखबार भी ले आते।</p>
<p>फिर अखबार में छपी दुनिया भर की खबरों पर चर्चा की जाती, सुबह सुने समाचार को “ब्रेकिंग न्यूज” की तरह पेश किया जाता और मुम्बई के लोगों की हंसी उड़ाई जाती कि बेचारे बिना पेट्रोल के ऑफिस नहीं जा पा रहे हैं।</p>
<p>फिर चर्चा की जाती कि मुम्बई के लोगों को ऎसी मुसीबत से बचने के लिए क्या करना चाहिए। आधे लोग आश्चर्य करते कि मुम्बई वाले चीन की तरह साइकिल पर क्यों नहीं चलते, बाकी आधे आश्चर्य करते कि पेट्रोल नहीं है तो छुट्टी क्यों नहीं ले लेते मुम्बई वाले, ऑफिस जाने की क्या जरूरत है?</p>
<p>और फिर सब दोपहर का खाना खा कर एक झपकी लेने अपने- अपने घर चले जाते&#8230;</p>
<p>लेकिन ऑफिस तो हमारा है मुम्बई में.. इसलिए तेल कर्मचारियों की हड़ताल का असर झेल रहे हैं, भीड़ से खचाखच भरी लोकल ट्रेनों और बसों में सफर कर ऑफिस पहुंच रहे हैं और बंद ऑफिस में बिना एसी के बैठे यह चिंता कर रहे हैं कि हड़ताल खत्म नहीं हुई तो शाम तक बसें भी बंद हो जाएंगी फिर घर कैसे जाएंगे, 20-22 किलोमीटर दूर घर है- पैदल चल कर कैसे जाएंगे, रसोई गैस भी नहीं मिली तो खाना कैसे पकेगा, शहर में खाने –पीने के सामान की किल्लत हो जाएगी&#8230;</p>
<p>काश, हमारा ऑफिस आज गांव में होता&#8230;
</p>
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</p>
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		<title>2008: तीन खान, कौन पहलवान?</title>
		<link>http://www.garamchai.in/?p=662</link>
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		<pubDate>Mon, 05 Jan 2009 08:38:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>फ़िल्में</category>
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		<description><![CDATA[सलमान, आमिर और शाहरुख खान की तीन बहुचर्चित फिल्में फिल्में 2008 में प्रदर्शित हुईं।
सलमान की “युवराज”, शाहरुख की “रब ने बना दी जोड़ी” और आमिर की “गजनी”। तीनों फिल्मों की कहानियां मुख्यत: प्रेम-आधारित थीं और उनकीं नायिकाएं खान- नायकों से लगभग आधी उम्र की थीं।
“युवराज” में सलमान की नायिका कैटरीना, “रब ने..” में शाहरुख की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सलमान, आमिर और शाहरुख खान की तीन बहुचर्चित फिल्में फिल्में 2008 में प्रदर्शित हुईं।</p>
<p>सलमान की “युवराज”, शाहरुख की “रब ने बना दी जोड़ी” और आमिर की “गजनी”। तीनों फिल्मों की कहानियां मुख्यत: प्रेम-आधारित थीं और उनकीं नायिकाएं खान- नायकों से लगभग आधी उम्र की थीं।</p>
<p>“युवराज” में सलमान की नायिका कैटरीना, “रब ने..” में शाहरुख की नायिका अनुष्का और “गजिनी” में आमिर की नायिका आसिन।</p>
<p>“युवराज” बुरी तरह पिटी और सलमान के हिस्से भी अपने थके चेहरे और बुझे अभिनय के लिए कटु आलोचना आई।</p>
<p>“रब ने..” और “गजनी” शाहरुख और आमिर के बदले “गेटअप” के कारण प्रदर्शन से पहले ही चर्चित हो गईं। शाहरुख ने आम आदमी का चोला धारण किया तो आमिर ने पहलवानी शरीर बनाया। “रब ने..” ने भी अच्छी कमाई की और “गजनी” ने भी कमाई के रेकॉर्ड तोड़े।<br />
लेकिन हमारी नजर में, कमाई के रेकॉर्ड तोड़ने के बावजूद “गजनी” के मुकाबले “रब ने..” अधिक लंबे अर्से तक याद रखी जाएगी। इसलिए, कि “रब ने..” एक साधारण जिंदगी में घटित होने वाली प्रेम कहानी थी जो फिल्म खत्म होने के बाद दर्शक के चेहरे पर मुस्कान छोड़ जाती हैं।</p>
<p>लेकिन “गजनी” दक्षिण भारतीय और हिन्दी फिल्मों के प्रचलित फार्मूलों का ऎसा मिश्रण है जिसमें प्रेम पर हिंसा का मसाला हावी हो गया है और फिल्म समाप्त होने के बाद दिमाग पर बोझिलता बनी रहती है।</p>
<p>“स्वदेस” और “चक दे” के बाद “रब ने..”,शाहरुख की एक और साधारण आदमी की असाधारण (और प्रेरक) कहानी साबित हुई है, जबकि “गजनी”, “फ़ना” के बाद आमिर की एक और मार्केटिंग सफलता लेकिन कहानी के नाम पर कबाड़ा फिल्म नजर आती है।</p>
<p>“गजनी” में हीरो-हीरोइन की प्रेम कहानी को छोड़ दें तो बाकी पूरी फिल्म असंभाव्य और बेतुके संयोगों से भरी पड़ी है। आमिर का अभिनय अपनी जगह अब भी दुरुस्त है, लेकिन कहानी के महत्व से उनकी पकड़ फिसलती जा रही है। “सरफरोश” और “लगान” जैसी चुस्त कहानियों की जगह बदन- बनाऊ और बाल-कटाऊ फार्मूले आमिर की फिल्मों पर हावी होते जा रहे हैं।</p>
<p>इसलिए हमारी नजर में तो शाहरुख ने ही 2008 में असली सफलता पाई, आमिर दूसरे नंबर पर रहे। सलमान फेल।
</p>
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</p>
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		<item>
		<title>अहंकार के वृक्ष पर विनाश के फल लगते हैं&#8230;</title>
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		<pubDate>Thu, 04 Dec 2008 09:03:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>नेतागीरी</category>
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		<description><![CDATA[मुम्बई हमलों के बाद भारतीय नेता ने जिस तरह का अहंकार दिखाया- अब तक दिखा रहे हैं, उससे यही कहावत याद आती हैं।
इन नेताओं के “ऎतिहासिक अपशब्द” याद दिलाने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह जरूर याद रखें कि जनता के गुस्से के बावजूद ये नेता मानने से इनकार कर रहे हैं कि उनसे कहीं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मुम्बई हमलों के बाद भारतीय नेता ने जिस तरह का अहंकार दिखाया- अब तक दिखा रहे हैं, उससे यही कहावत याद आती हैं।</p>
<p>इन नेताओं के “ऎतिहासिक अपशब्द” याद दिलाने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह जरूर याद रखें कि जनता के गुस्से के बावजूद ये नेता मानने से इनकार कर रहे हैं कि उनसे कहीं कोई गलती हुई।</p>
<p>तीन उच्च पदस्थ नेताओं को इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन वे इस्तीफा देने से तब तक इनकार करते रहे जब तक उन्हें जनता के दबाव में कुर्सी से घसीट कर अलग नहीं किया गया।</p>
<p>महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल ने तो तो भी इतनी शरम दिखाई कि इस्तीफा देने के बाद अपने गांव चले गए और मीडिया से दूर रहे। मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने इतनी शरम भी नहीं दिखाई।</p>
<p>उनके अहंकारी बयानों की कुछ मिसालें “बेटे को साथ ले गया तो गलत क्या किया?” ( ताज और ओबेराय के सरकारी मुआयने के विवाद पर), “किसी को तो जिम्मेदारी लेनी पड़ती है. केंद्रीय गृहमंत्री और राज्य के गृहमंत्री ने इस्तीफा दे दिया है, मुझे नहीं लगता अब मेरा इस्तीफा स्वीकार किए जाने की जरूरत है”, “मैं दो बार मुख्यंत्री बना और मैं सबसे भाग्यशाली तथा सबसे प्रसन्न व्यक्ति हूं कि मुझे संगठन से इतना कुछ मिला” ( इस्तीफे की प्रेस कांफ्रेंस में)।</p>
<p>यह सब हंस –हंस कर, अपने ही मजाक पर ठहाके लगाते हुए, अपने भाग्य और प्रसन्नता का सार्वजनिक वर्णन उस जनता के सामने करते हुए जो अब भी दुख, गुस्से और अपमान की आग में जल रही है।</p>
<p>सत्ता की थाली में जिन्हें लड्डू समझ कर नेताओं टपक रही है, वे इसी अहंकार के वटवृक्ष पर लगे विनाश के फल हैं।</p>
<p>जितने खाए हैं, पेट फाड़ कर निकलेंगे। आ गया है वह दिन।
</p>
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		<title>चंद्रयान, हम और आप</title>
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		<pubDate>Mon, 17 Nov 2008 08:13:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>नया भारत</category>
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		<description><![CDATA[भारत चांद पर जा पहुंचा है? यकीन नहीं होता&#8230; यह महानगरों की टूटी- फूटी सड़कों वाला, गांवों में गुल बिजली वाला देश चांद पर जा पहुंचा है? कब हो गया, कैसे हो गया, किसने किया यह चमत्कार?
जब हम सरकारी दफ्तरों में चाय पीते, फाइलें टालते समय गुजार रहे थे, घर का कचरा गली में फेंक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>भारत चांद पर जा पहुंचा है? यकीन नहीं होता&#8230; यह महानगरों की टूटी- फूटी सड़कों वाला, गांवों में गुल बिजली वाला देश चांद पर जा पहुंचा है? कब हो गया, कैसे हो गया, किसने किया यह चमत्कार?</p>
<p>जब हम सरकारी दफ्तरों में चाय पीते, फाइलें टालते समय गुजार रहे थे, घर का कचरा गली में फेंक कर सफाई कर रहे थे, सड़कों पर थूक रहे थे, भाषा-जाति-धर्म-प्रांत के नाम पर फूट डालने वाले नेताओं के पीछे अंधों की तरह भाग रहे थे, सिनेमा और क्रिकेट के नायकों पर फिदा हुए जा रहे थे&#8230;.</p>
<p>तब कुछ गुमनाम वैज्ञानिक देश के किसी गुमनाम कोने में अपने जीवन के अमूल्य वर्ष बिता कर भारत को चांद पर भेजने के लिए काम कर रहे थे। चंद्रयान को बनाने के पहले और उसके जरिए  चांद पर तिरंगा भेजने के बाद भी, ये सारे वैज्ञानिक अब भी स्वेच्छा से गुमनामी में हैं, अब भी भारत के लिए काम कर रहे हैं।</p>
<p>आज लालबहादुर शास्त्री होते तो उन्हें इन वैज्ञानिकों पर गर्व होता।</p>
<p>भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खां, सुखदेव और राजगुरू होते तो उन्हें इन वैज्ञानिकों पर गर्व होता।</p>
<p>क्या आपको गर्व है अपने इन देशवासियों पर जिनकी कर्तव्यनिष्ठा से आज चांद पर तिरंगा मौजूद है?</p>
<p>अगर है, तो कृपया आप उनके सम्मान में कुछ करिए।</p>
<p>ज्यादा नहीं, सिर्फ इतना ही कि आपके जो सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य हैं उन्हें निभाने की कोशिश करिए।</p>
<p>कोशिश करिए कि जिस दफ्तर की तनख्वाह आपको रोटी देती है, उसका कार्य पूरी निष्ठा से करें।</p>
<p>कोशिश करिए कि सार्वजनिक स्थान पर आप कचरा फेंकने के भागी न बनें।</p>
<p>कोशिश करिए कि ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन आपके द्वारा न हो।</p>
<p>कोशिश करिए कि बिना लाउडस्पीकर लगाए समारोह- त्योहार की खुशी मना सकें।</p>
<p>कोशिश करिए कि अपने गांव- शहर- कस्बे में वृक्षारोपण करने में सहभागी बन सकें।</p>
<p>कोशिश करिए कि बांटने की भाषा बोलने वाले हर राजनेता से दूर रह सकें।</p>
<p>सबसे बढ़ कर: <strong>यह मत देखिए कि दूसरा क्या कर रहा है, यह देखिए कि आप क्या कर रहे हैं।  </strong></p>
<p>बहुत सारी बातें हैं जो आप अपने देश को गर्व करने लायक बनाने के लिए कर सकते हैं।</p>
<p>कोशिश तो करिए।
</p>
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		<title>दादा के लिए संदेश, ट्रक के पीछे</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Nov 2008 12:38:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेखचिल्ली</dc:creator>
		
	<category>क्रिकेट</category>
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		<description><![CDATA[सौरव गांगुली उर्फ क्रिकेट प्रेमियों के दादा रिटायर हो गए ( मतलब, कर दिए गए)। आज नागपुर में ऑस्ट्रेलिया के साथ खेला गया वर्तमान श्रृंखला का चौथा और आखिरी टेस्ट उनके टेस्ट जीवन का अखिरी टेस्ट था जिसमें अपनी आखिरी टेस्ट पारी में वे शून्य पर आउट हुए। ठीक डॉन ब्रैडमैन की तरह।
डॉन ब्रैडमैन को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सौरव गांगुली उर्फ क्रिकेट प्रेमियों के दादा रिटायर हो गए ( मतलब, कर दिए गए)। आज नागपुर में ऑस्ट्रेलिया के साथ खेला गया वर्तमान श्रृंखला का चौथा और आखिरी टेस्ट उनके टेस्ट जीवन का अखिरी टेस्ट था जिसमें अपनी आखिरी टेस्ट पारी में वे शून्य पर आउट हुए। ठीक डॉन ब्रैडमैन की तरह।</p>
<p>डॉन ब्रैडमैन को अपने टेस्ट जीवन में 100 का रन औसत हासिल करने के लिए सिर्फ चार रनों की रनों की जरूरत थी लेकिन वे अपने टेस्ट जीवन की आखिरी पारी में सिर्फ चार गेंदें खेल पाए और फिर शून्य पर आउट हो गए।</p>
<p>अब जब दादा जबरन रिटायर कर दिए गए हैं तो लाखों अन्य क्रिकेट प्रेमियों की ओर से उन्हें एक संदेश भेजा जा रहा है, भारत की सड़कों पर दौड़ते हजारों ट्रकों के पीछे लिखा हुआ।</p>
<p>&#8220;टाटा&#8230;&#8230; फिर मिलेंगे!”</p>
<p>इंगलैण्ड से घरेलू और पाकिस्तान से पाकिस्तान की धरती पर मुकाबला है अगले 2-3 महीनों में।</p>
<p>नतीजे बताएंगे किसकी –किसकी खटिया खड़ी होती है।</p>
<p>तब तक आस लगाए रखिए दादा की वापसी की। जैसे वे भी लगाए हुए हैं, चाहे ऊपरी तौर पर कुछ भी कहें <img src='http://www.garamchai.in/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />
</p>
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